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Sunday, August 15, 2010

मेरे सपनों का भारत

किसी भी इन्सान को जानने का सबसे आसान तरीका है उसकी कही, उसकी लिखी बातों को जानना, पढना और समझना। विशेष रूप से जब हम किसी ऐसे महापुरूष के बारे में जानना चाहते हों जिनको गुजरे, ज़माने बीत चुके हों तो उनके विचारों को जानने का सबसे आसान और उचित तरीका है उनके सार्वजनिक भाषणों का संकलन। यही सब सोचकर शायद "मेरे सपनों का भारत" लिखने का नेक काम किया गया होगा जो न सिर्फ़ बापू के विचारों से हमें अवगत कराता है बल्कि सफ़लतापूर्वक एक जीवन आदर्श पेश करता है।


महात्मा गान्धी, जैसा कि कहा जाता है और मैं बचपन से सुनता रहा हूँ, न सिर्फ़ भारत की आजादी के महानायक थे, बल्कि एक सर्वमान्य नेता थे जिन्होंने भारत को भारत बनाया एकता के सूत्र में पिरोकर। पर शायद कोई भी इन्सान सर्वगुणसम्पन्न नही होता या फ़िर ऐसे लोग सबको पसन्द नही आते। तो स्वाभाविक है कि गान्धी जी के बारे में हमेशा या सबसे अच्छा ही नही सुना। कई लोग मिले जो ये मानते हैं कि गान्धीजी ने स्वतन्त्रता संग्राम का दुरुपयोग किया अपने आप को महान साबित करने के लिये।


अलग-अलग लोगों से अलग अलग बातें सुनकर अंततः मैने पाया कि इस विषय पर कुछ भी कह पाऊँ, इस योग्य होने के लिये गान्धी क्या सोचते थे ये जानना जरूरी है और तब मैने "मेरे सपनों का भारत" पुस्तक उठायी और अध्ययन शुरू किया। उसमें जो कुछ भी पसन्द आया उसे अपनी डायरी में लिखता गया। आज जब अपनी डायरी देखता हूँ तो लगता है जैसे एक पूरा जीवन पड़ा हो इसमें।

मैं मानता हूँ कि बहुत सारी बातें जो उन्होंने कही थी वो बिल्कुल अलग परिप्रेक्ष्य में थीं और आज अजीब सी लगती हैं, पर ऐसी बहुत सी बातें वो कह गये जो आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं जितनी तब थी। उदाहरण के लिये, जब आज कुछ लोग पश्चिमी सभ्यता के अन्धानुकरण में और कुछ लोग उसके अन्ध विरोध में लगे हैं तो गान्धी की बात ध्यान देने योग्य है - "विशेष परिस्थितियों वाले एक देश के लिये जो बात अच्छी हो, जरुरी नही कि वो भिन्न परिस्थितियों वाले दूसरे देश के लिये भी अच्छी ही हों। यूरोपीय सभ्यता बेशक़ यूरोप के निवासियों के लिये अनुकूल है लेकिन यदि हमने उसकी नकल करने की कोशिश की तो भारत के लिये इसका अर्थ अपना नाश कर लेना होगा। पर इसका मतलब ये नहीं कि उसमें जो कुछ अच्छा और पचाने लायक हो, उसे हम ना अपनायें। पश्चिम के पास ऐसा बहुत कुछ है जिसे हम अपना सकते हैं और लाभान्वित हो सकते हैं।"

इस पुस्तक से यह भी पता चलता है कि जिनकी वजह से भारत है, वही अगर आज जिन्दा होते तो ऐसे भारत में रहना पसन्द नही करते! गान्धीजी ने खुद कहा था, "यदि भारत ने हिंसा को अपना धर्म स्वीकार कर लिया और यदि मैं उस समय तक जीवित रहा तो मैं ऐसे भारत में नही रहना चाहूंगा।"

आज हम बात करते हैं सरकार की, सारा दोष किसी भी परेशानी का सरकार पर डाला जाता है। गान्धीजी को शायद अनुमान था इस बात का। तभी तो उन्होंने कहा था, "स्वराज्य का अर्थ है आत्मनिर्भर होना। यदि अपना शाषण होने के बाद भी हम हर छोटी समस्या के लिये सरकार का मुँह ताकना शुरू कर दें तो उस स्वराज्य का कोई मतलब नही रह जायेगा।"

अन्त में बस इतना कहना चाहूंगा कि गान्धीजी की इस पुस्तक से अगर थोड़ा भी हम अपने जीवन में उतार पायें तो कहीं बेहतर जिंदगी जी पायेंगें। और उनकी एक बात तो कम से कम माननी ही पड़ेगी कि "जो व्यक्ति अपने कर्तव्य का उचित पालन करता है उसे अधिकार अपने आप मिल जाते हैं।"
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पुस्‍तक का नाम - मेरे सपनों का भारत

लेखक - महात्मा गॉधी
पृष्‍ठ - 272
प्रकाशक : राजपाल प्रकाशन
जनवरी 01, 2008


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-अम्‍बरीश अम्‍बुज


स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाऍं


यह पोस्‍ट अम्‍बरीश अम्‍बुज ने लिखी है ।












9 comments:

  1. बधाई.......आपके प्रशंसनीय प्रयास के सफल होने की कामना के साथ

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  2. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

    सादर

    समीर लाल

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  3. महापुरुषों को जानने से ही नहीं, उनका और उनके विचारों का तात्कालिक और वर्तमान परिस्थितियों के सापेक्ष उद्देश्यपरक तथा आलोचनात्मक मूल्यांकन करने से ही कोई समाज आगे की राह निकाल सकता है।

    कई बार हमारी सीमित समझ अनुकरणीय आत्मपरकता में उलझती सी चली जाती है।

    इस आदर्शवादी प्रासंगिकता के बाद, आगे की आलोचनात्मक परख़ का इंतज़ार रहेगा। अच्छा प्रयास।

    शुक्रिया।

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  4. कि "जो व्यक्ति अपने कर्तव्य का उचित पालन करता है उसे अधिकार अपने आप मिल जाते हैं।"
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    akdam sach hi kaha tha mahatma-gandhi ji ne.
    aaoko swatantrata-diwas ki hardik badhai.
    poonam

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  5. मुझे ऐसा लगा की २७२ पृष्ठ की पुस्तक को आपने छू भर दिया. इतने कम में समेट दिया. जी नहीं भरा. ये दिल मांगे मोर......

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  6. @ समय, बिल्‍कुल सही कहा आपने । "विचारों का तात्कालिक और वर्तमान परिस्थितियों के सापेक्ष उद्देश्यपरक तथा आलोचनात्मक मूल्यांकन" ही सबसे महत्‍वपूर्ण है । इसी से आगे की राह वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में निकल सकती है ।

    @ VICHAAR SHOONYA, अम्‍बरीश की यह पोस्‍ट संक्षिप्‍त है , किन्‍तु प्रशंसा की बात है उन्‍होंने शुरुआत की । और सदस्‍यों के लिखने पर पर धीरे धीरे पोस्‍टें आकार लेंगीं ।

    @ संजय भास्कर, समीर लाल , poonam, ब्‍लॉग पर आने और टिप्‍पणी करने के लिए आप सभी का शुक्रिया ।

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  7. सही कहा आपने , "विचारों का तात्कालिक और वर्तमान परिस्थितियों के सापेक्ष उद्देश्यपरक तथा आलोचनात्मक मूल्यांकन" ही सबसे महत्‍वपूर्ण है ।

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  8. अच्छी प्रस्तुति।

    वैसे महात्मा का ये कथन "जो व्यक्ति अपने कर्तव्य का उचित पालन करता है उसे अधिकार अपने आप मिल जाते हैं"...आज के दौर में कितना सामयिक और सटिक है, सोचने की बात है।

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  9. thank u because of this i can develop my eassy

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