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Sunday, March 20, 2011

होली की बहुत बहुत शुभकामनायें ......!!!

 
आप सभी को पुस्‍तकायन ब्लॉग की ओर से ..........रंगों के पर्व होली की बहुत बहुत शुभकामनायें ..
रंगों का ये उत्सव आप के जीवन में अपार खुशियों के रंग भर दे..

Thursday, March 17, 2011

करुणा की शक्ति ( The Power of Compassion) : दलाई लामा

बीसवीं शताब्दी में अनेक महापुरुष, जिन्होने अपने विचारों व सात्विक आचरण से सम्पूर्ण विश्व जनमानस के अंतर्मन को विशेष रूप से प्रभावित किया है, उनमें दलाई लामा का नाम निश्चय ही शीर्ष पर आता है । उनके भाषण व प्रवचन के मेघ से मानो प्रेम, वात्सल्य, दया व करुणा की शीतल वृष्टि सी होती है ।वे सदैव अपने संभाषण में वैश्विक स्तर पर मानव जाति की अंतर् निर्भरता, आयुध व्यवसाय के होड़ व इससे उत्पन्न हो रहे ख़तरों, पर्यावरण-विनाश व इसके ख़तरों, एवं बढ़ती असहिष्णुता के प्रति अपनी चिंता व संवेदना से जनमानस को अवगत कराते रहे हैं ।

Tuesday, March 8, 2011

पितृसत्‍ता के नए रूप : स्‍त्री और भूमंडलीकरण

"भूमंडलीकरण कहता है कि उसके तहत हुआ बाजारों का एकीकरण लैंगिक रूप से तटस्‍थ है अर्थात वह मर्दवादी नहीं है। यह एक ऐसा दावा है जो कभी पुनर्जागरण के मनीषियों ने भी नहीं किया था। भूमंडलीकरण इससे भी एक कदम आगे जाकर कहता है कि नारीवाद की किसी किस्‍म से कोई ताल्‍लुक न रखते हुए भी उसने स्‍त्री के शसक्‍तीकरण के क्षेत्र में अन्‍यतम उपलब्धियॉं हासिल की हैं। सवाल यह है कि परिवार, विवाह की संस्‍था, धर्म और परंपरा को कोई क्षति पहुँचाने का कार्यक्रम अपनाए बिना यह चमत्‍कार कैसे हुआ? स्‍त्री को प्रजनन करने या न करने का अधिकार नहीं मिला, न ही उसके प्रति लैगिक पूर्वाग्रहों का शमन हुआ, न ही उसे इतरलिंगी सहवास की अनिवार्यताओं से मुक्ति मिली और न ही उसकी देह का शोषण खत्‍म हुआ - फिर बाजार ने यह सबलीकरण कैसे कर दिखाया ? 

Saturday, March 5, 2011

मैं पाकिस्‍तान में भारत का जासूस था

यह आपबीती है एक भारतीय जासूस मोहन लाल भास्‍कर की । जिन्‍होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद मुहम्‍मद असलम बनकर (इसके लिए इन्‍होंने सुन्‍नत करवा ली थी) पाकिस्‍तान में प्रवेश किया। भारत में इनके पीछे इनके वृद्ध माता-पिता और साल भर की ब्‍याहता पत्‍नी रह गई थीं, जो तीन महीने की गर्भवती थीं।

पुस्‍तक अत्‍यंत रोचक है। इस अंदाज में लिखी गई है कि उबाती नहीं है। पुस्‍तक जासूसी उपन्‍यास का मजा देती है, लेकिन घटनाऍं कहीं भी नकली नहीं लगतीं। सच्‍ची कहानी पर आध‍ारित होने के कारण रोमांच और बढ जाता है। मैंने शीर्षक देखकर इस पुस्‍तक को उठाया कि जासूसों की जिंदगी के बारे में कुछ जानने को मिलेगा। 

लेकिन यह पुस्‍तक तात्‍कालीन सत्‍तर -अस्‍सी के दशक में भारत पाकिस्‍तान संबंधों, खासकर पाकिस्‍तान की सामाजिक राजनैतिक स्थिति का एक बेहद जमीनी दृश्‍य प्रस्‍तुत करती है। साथ ही पाकिस्‍तानी जेलों में उस समय बंद कैदियों के जीवन को भी विस्‍तार से दिखाती है। पढने से लगता है कि किताब अनुभव से गुजर कर लिखी गई है। 

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